Saturday, September 17, 2011

चाय

कैसी गजब की ताकत होती है ना आग में
पानी के बूंद-बूंद को
खौला देती,
शक्‍कर के हर दाने को
देती है अनंतता
और उद्वेलित करती है
चायपत्‍ती को
कि वह अपने अंदर की पूरी प्रतिभा
बाहर निकाल दे

कैसी अजब सी ताकत होती है ना आग में
कि वह तीन अलग अस्तित्‍व को
समेटकर
बनाती है एक. . . . . .चाय

6 comments:

  1. इन सामान्‍य बिम्‍बों से भी अर्थपूर्ण व भावपूर्ण कविता बन सकती है, आश्‍चर्य..., धन्‍यवाद पूनम जी.

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  2. एकदम कड़ी, मीठी.

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  3. बहुत दिनों बाद इतनी बढ़िया कविता पड़ने को मिली.... गजब का लिखा है

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  4. हम तो इसीलिये पीते हैं।

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